पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/४८

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ना मालती की माल सी विमलं परिमल मई...." किसलय कुसुम सुपद्मिनी की जोति है। सांधे भीने छूटे यार भार तिहिं अकुलाइ' डोले भर मोतिन की लर अरसाति है। कहै कवि 'पालमा कुमारी वृपभान की सु, ऐसी सुकुमारि देखि छतिया सिराति है। अलप घहि केलि' शलवेली 'अकुलाइ, कमल-कलो ज्यों परसे ते कुम्हिलाति हैं ॥७॥ जुवती .जहाँ लौं आई छवि उज्यारी छाई, । कुंज है जगमगांत जीन्हि कोऊ जानि । मैं हू पहिचानी उन भाप पहिचान्यो नहीं, . अजहूँ "मनोज हूँ • सो नहीं पहिचानि है। कहै कषि 'पालमान ऐसी कहूँ देस्त्री मुनी, रीकि रीझि रहौ कान्ह देखें मनु मानिह । सुखही की राति रसरासि अपरासि ऐसी, . रोम रोम नखं सिख पानिप की खानि है ॥ ससि है चकोरनि को भोरनि को कॉल-माल; . ___‘मृगनि फो नादमई सुन्दरी सुजान है। फेलि को फलपतरु सोभा ही को रतिपति, .: कामे को पियूष ऐन काम ही के वानर है। __mamimmimmmmmipimmmmmmmmm ___१- परिमलमई - सुगंधयुक्त । २-पाग- (ग) रंग।