पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/५०

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३५. की दूती नायकी सुनि चित चालासी सोना काल पहिरे कुसुंभी सारी सादी सेत आँगो आँग, छानी छवि चाहि फेरि छाह ही चहति है। चूड़ा पाइ फेरि करि बेलरि सुधारि धरि, - फैकन करनि किरि मन 'उमँगति है। फहि कवि 'आलम' वनति फिरि ठाढ़ी होति, आलिनु के साथ अलबेल्यो हो करति है। अलंग लग्यो सो लाँकु बोले डग डोले ऐसे, . डगनि भरति जनु लगसो लफति है | सुनि चित चाद जाको किकिनी की झनकार, करत कलासी सोई गति जु विदेह की । 'सेस' भनि आजु है मुफेरि नहि कारह जैसी, • निसी है राधे को निकाई निधि नेह की । फुल की सी आमा सप सोभा लै सोलि धरी, लि ऐहै लाल, भूलि जैहै सुधि गेह की। कोरि कयि प.२ तऊ परनि न पा फरि येसरि उतारे छपि येसरि के वैह की ॥२॥ अलबेलो बैस याल'चंदेली की माल गले, अलबेली प्रीति रिय रंगीली रंगमगै । सोने की सी छरी छयि छाजति छयोलो तिय, अंग अंग ठौर ठौर किलमिली सी लगे। 1-मगतो संधी नवकीली चौत को लौर। २-प- कोशिश करें। ३-फाय फरन। ५-यह % (प) मंद। . की । ....~ram