पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/५२

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माफी दसोपा पानिए सो मोती जैसे थहगत थार पर, - तैस 'चपहा मैन थिरकनि थोरी है। पचन के आगे भार भौहनि अगाउ जाद.", . . सजनो समुझि रीमि आप मापे' भोरी है। 'पालमाकर हो विधि उरते उतारि आनि, .. पान की सो अनी सो उलटि कार्टि जोरी है। मीनी ऑगी झलके उरोज को फसाउ फसे, आवक लगाय पाउँ पायक' ते गोरी है ॥६॥ तरल२ तुरंग नैना तमनाई भरि पाई, ' । गोरे मुख सोह 'अरुनाई' अधरन को। सरल सुदेस केस तरल 'तरोना' दोऊ, । चलत फलाई नीके ललित "करन की। अमर-मरति कपि 'पालमा है मेरे जान, कोऊ अमरायती ते .याई अमरनको । रंभा न भायै ऐसे रूप को मारंभ' देखि, ___ सोभित सरीर मधि ग्रामा आमरन की ॥ ७ __ रस भरी रूपे भरी सुखद संयाम भरी । सोमों के सुभाई भरी ऐन मैनका सी है। दर्पन सी देह ऐसी को नई नयल,' ..., "ग्रज में ने देखो कोऊ सुरपुरयांसो है। रप भाएँ मोरो ? = अपनी समझ में भोली भाली है । २-तरल = चंचल । -तरोना= कर्णफूल । .. अमरन को देवकन्या ५-प्रारंमप्रथमोस्थान, उठान।" . .