पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/५३

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अलग-कोलि 'श्रालमा सुकवि लोनी सोने के सरोजहू, ते. फूल ही के भार' भरि-पान की लता सी है। चंदन चढ़ाये .चंद चाँदनी सी छाइ रही... चन्द्रमा सी मुख छयि हाँसी चन्द्रिका सी है । . !: , - . ससि. ते सरस मुख. सारस से राजे नैन, जोन्ह ते उजारो रूप रवनि रसाल सी। रति हू ते नोको प्यारी प्यारे कान्ह जाके पाछे, बैनी की बनक डोले मानो अलि भालसी । सारी सेत सोहै ,कवि 'बालम विहारीः संग,' .. ..... चलति., बिसद गति : पातुर उताल सी । फूल ही. के भार भरि सीस फूल फूलि रहे, .... फूली सांझ फूलीआवै फूलन की माल सी nel व्रज की नागरी ब्रजनाथ अति. प्रान प्यारी, चली रूप यनि पनि यासव की पाल५ सी-1 .रसिक रखन,, तजि , पारस. सरस •मति,, रसना की ध्वनि योली रसना रसाल सो। गोरे गात गहनो जराउ को जगमगत, :.; . .. ऐसी फयि श्रालम' है जोवन-सु-भा* लसी। . दोपति, नवीन नग पाँति पट, झीने. मानो, कंचन के खम में दिंपति दीप मालं सो ncoll र-भार = वजन, तौमानि = ( रमयो) यी ३-पली माँ = संध्या समय । ४-मली-अति हर्षित।.५ चासव की माल पौरपाटी। '६-सना = किंकिणी। * मुभा मुदर घटा। .