पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/६०

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४५ मानिनी येगि प्रजराज तजि फाज नेकु चलि तहाँ, ..

जहाँ पैरी प्यारी है सकल सुम्स दैन की ।

'आलम' चकोर यिन चंद की चमक ऐसी, चकित झै रहै नहीं आवै यात चैन की । सेज पर अनुवनि सानि के सुमन सब, . सैनन सुनावै सु सकति नहीं चैन को । राति सिसिराति न सिराति सुसुरतिहीन, ... ' सारस पदनि सु सताई अति मैन की ॥१०॥ यिथा को विचार कै सफानी हू ने जान्यो ने कुं पोरी होति जाति अरु तातो सीरो गातु है। सुमन सुहाते ते तो हिये हूँ ते होते३ कारि, .i .. नैननि सो चाँद नेकुहेरेन हितातु है। तुम्हरे बियोग कवि 'पालमा विरह पंख्यो, . . • तुम बिनु प्यारे हरि कंछु ने यसातु है । ... आई को ओर आये ऐसी गति होति भई, ओरती से नैना आँगु ओरोसो ओरातु ॥१०॥ १-सिसिराति सरदी यड़ती जाती है।" २-सिरात = योतती है। ३-हिये हतें होते फरि-हृदय से त्याग दिये हैं। -हितात है = घरछा लगता है। '५-आइभायु !' ६ - औरती मोलती। मोरातु खतम हया जाता है।