पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/६२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


... श्रय कवि 'पालमा विछोहे विनुछिनु तिय, पिय पोय कहि कहि कहै कहो कहाँ स्वै। सुरति समानी मन मनहीं मैं देखि बोले, . मोरे, जान पाँचहू समाने पाँच रूप है ॥१०॥ पिय जक, लागे हूँ विकल : यकि थकि जाइ। पूछे है न..फहै कछु कामं छाया है छली 1:"पालमा सुकयि लोग कहत मकरै । और, अति के मरूरै काम डरी मरी है अली । तो उपचारु कीजै तोतोई विकास होतु.... जानि ऐसौधात:हो तो प्यारे तुम पै चली। चन्दन चुवाये नलिनी को रसु. नाये श्राँगु, । .: पानी पाये जैसे प्रजाति चूने की कली ॥११॥ ....;. . ; 2' .. . अटा चढ़ी हुती विधु:छटा सी वोली, प्यारी, उझकि झरोखा"तुम. कान्ह ठाढ़े है' कहूँ । उतही गिरी हो२ चैसी जीन पाली श्रानि लागै, जीवन की औधि ही सुऐसी टरी टेक है। 'श्राजमा:मयंक पूरो परिवा सो है गयो है : कुहू जौन पर तो रही ही कला एक हूँ। एतिय भई ते अब जो न येगि ऐहो प्यारे, .. . . . पहो निरदई तोहिं दया.. नहीं नेक हैं ॥१२॥ ........ wrmirmir १.३ = थे। 1-1-दो -यो। . ..' -~-