पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/६४

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ल वर्णन संकेतस्थल वर्णन जन्त्र है न जरी कछु मरी जाति कन्त बिनु, 'नेह निरमोही के न मन्त्र मानियत है। चन्दन चितएं वरै चाँदनी न चाही पर, चन्दाह की पोट को चंदोवा तानियत है ॥१९॥ सीतल पनारी' जानि डारी पंच नारिन मैं, ___ पानी की पनारी२ चहूँ ओर भरी परि है। श्रोस में प्रसारि फै उसीर यानी सोरी करि, तैलिये तुपार घनसार हू की धूरि है। 'आलम' कहै हो एह जतन जुड़े ना चाल, .. जीय की कठिन जोवो जुवती को दुरि है। श्रास यहै एक है उसाँस जान रुंधे छिनु, नेहु के निवाहिये को श्राहि बड़ी मूरि है ॥११॥ इहाँ तो ठकुरई है. अवै नहीं और 'चार, रावर जु' आपने सुभाइ कोहूँ थारही। 'सेस' कहै उनके तो उनै रहे 'नैन भरि, मोहिं फेरि मोहन बिलंय दरसाइहो । अब न चले तो फिरि चलि न सकोगे उन, सुवन कान्ह 'कहूँ ठाहर न पाही। श्राइ घर राम्रो पैठि घरनि को घेरि नातो. धरिक में हरि घरनाई चदि जामौ ॥११॥ १-नारी- पौनार (पताल ) कमउनाल । २..पनारी- माला ३.-मादि-आह, ठंडा सारा । ४-गहर जगह, स्थान। ५-परना- पन्नई, पहों को पनी हुई नाय । - - - - - - - -