पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/६६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


५१. Ve B.संकेतस्थान पर एती रंभई मोहिं इता आये मेरौ उत.' ! 'मनु ! तुम विनु सधैः तनक न ओ' है। चूनौ सो लग्यो है यांग सुनो स्याम विधांपाकी, ... सूनो मौन देखि ताहि दूनो दुख होते है ॥१२॥ अधर 'अधर विनुः धिरेन धरति धीर, माधौ. सुधानिधि चाके मान के अधार । पिलपति."बाल सुअवल बोले घोल लाल, योलति है बिलखि यिलोकति है वारजू । 'आलम अलपं, साँस रही है. सरीरसोई, I. जतनन सखी राखै कीने सोधि' सार 'जू । वसन बिसारे-वैसी. मदन घिसिख यति, विसा को लहरि जैसे जाति बिसँभार जू ॥१०॥ रूठे ते न ठऔर छाँडे उहै न उठाये हति कठिन. हठीली, अति वैठी निठुराई के । कोक की कहानी कहै,तासों .फही कहीं कहीं ____ 'आलम' जु कहि रहै जानि हौ कुराई५ । मेरी न सिखति सिन पुनी. सिखाय सिख, सलिनु फो सिम थकी लिख खो दुराई के । - - तुम हो चतुर चतुरापोधे तो चातुरी है,.. चाहि चित चोरि लेहुं, एक चतुराई के ॥१२॥ १.१-श्रोताराम । --चारद्वार ! | ३-सार-प्रबंध। जाति विसँभार-घेहोश हो जाती है । ५-तुराई करता।-चतुरा । चतुरपना । . . . . . . . .