पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/६७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


आलम केलि - - कहूँ मोती माँग फहुँ पाजूयन्द भावा झरे, .. कहूँ हार फंकन हमेत . टाई टीक है । ऐसे कै विसारी स्याम. ऐसी यैस ऐसी याम, पिहकि पपीहा; को सी धार बार.पी कहै । 'सेख प्यारे श्राजु कालिमाल चाल देखो पाइ, छिन छिन जैसी तन-छीजन की छीक है। सेज.मैन-सारी सी.है सारी हूँ विसारी सी है... विरह विलाति जाति तारे को सी लीक है ।।१२२॥ कीजिये न चार यह यार और बार नहीं, नै घार लागेहू. ते चार ते पिसेसिहो । खरी है निसाँसी से तौकीनी है यिसासीमारि, दसई दसा सी लाख भाँति सखि ' लेखिही । जानत हो लाल जैसे होत हैं हवाल फिरि,... वाल ,विसगइये को रेख शान रखिही। पाखक ते पोग्वति ही पाखुरी सी राखी है मैं, प्यारे फिरि लागे पल रास प्रानि देखिही ॥१२॥ पान की सौ पान खाये हेम केसे पानी न्हाये । पीयूप सो पान किये पानिप है जो कही । कोककला की सी याला कोकिला सी फल कुल, शाम.श्री करनाल र जेनी कला श्रोक हो । रह - भुनदर का प्राण । -- का श्राभुषण! -झोक आय। -४मैन-सारी=मोमकी यी मोर।५-निर्मामी स्नर हीन (मुदा सी)। ६-पान की सी% पान की हतारी मुलायम ।।