पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/६८

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'श्रालमा विचित्र हरियो हो रिझाय आई, आपनी हितू यै जानि आये वाकै श्रोक ही । लोल लता ललित ललामंताई ललिता की, • लाल लालची फै लाई लय अवलोक ही ११६॥ सखी की उक्ति सखी प्रति. नेह सौ निहारे नादु ने आगे कोने बाहु, " छाँहियो 'छुवंत नारि नाहियों करति है। प्रीतम के पानि पेलि अपनी मुजे सलि, " . . .घरकि संकुचि हियो गाढ़ी के धरति है। 'सेख । कहि श्राधे घेना बोलि करि नीचे नैना, हा हा करि मोहन के मनहिं हरति है। फेलि के अंरम्भ खिन सेल के बढ़ाय" को, प्रोदा जी प्रवीन सो नदोढ़ा है 'ढरति है ॥१२५॥ कोरे आनि लॉगै पिछवारे सखो जागे सौति, : । श्रास पास मौन के, उसाँस हो को भर है। उन यसि फीने फान्ह देखनन पीने काह, . - मैं हूँ बस केही न दिखही कछू पर है। ................................................ १-कोरे-दरवाने का एक पकया। :. .-