पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/७१

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आलम फलि । " तरुनी की डग कहा मुनि ही डुलावे - सुर, . मुरली के सुनत' डुलाचे सीस,डावरी'। पेम को परोइ' लीजै यिरह न योरि दीजै, :. . नेह को निहोर कीजै छोपिनु पाँवरी ॥१३॥ घर है कि वनु ह्याँ न भूलि परी जनु तेरो, कहा भयो- मनु कहि कौने घसि कीनो है। जको सी श्री धफी सी है चितवति चकीसी है, छली है कि छकी है कि काहू कळू दीनी है। 'पालमा विकल धागो मैन को ठगौरी लागी, नैननि की ढौरी लागी ताते तनु छीनो है। यहाँ सुठौरई.,..है परवस: धौरई. है, . हो नहीं सो औरई है जाको नाँउ- लीनो है ॥१३२॥ हँसे हँसि देश योले योले औ न खोल पेम, याते पहिचानी कछु पीरी पोरी है भई ।. 'आलम' कहै हो या हिये की पोढ़ाई देखो, कैसे के दुराई माई प्रीति कान्ह सी नई । अवै अनमनी हुती सुवा भरति ठादी, . .. औचक ही धाइ धाइ भुज भरि है लई। पूछे तिहि असुवा फहे हो ? कहै कैसे आँसू, । १., पलके. पसारि - दई पुतरीनु · पी गई ॥१३३० -डायरी-छोकरी ( नोदा).। २--परोय लोमान सेना पाहिये । ३-वागो = घुमती फिरती है।१-पार-दूध पिलानेवालो। .........cimmm