पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/७२

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An की उत्तिसम्म फलो साँझ' के सिंगार सूही सारी जही हार, .. सोनो सो लपेटे गोरी गौने फी सी आई है। 'पालमा न फेरफन्द जानत ही चंदमुखी. . ! नन्द : भौन,दीपक जगाइये को ल्याई है। जोति सो जुरति जोति भागे नैना जुरे जाइ, चातुरी अचेत, भई त्रितयो कन्हाई है। घाती रही हातो रसमानो छवि छाती पूरि. पाँगुरी भई. है मति आँगुरी लगाई है ॥१३४॥ सखिन बुलावै, कान्ह मुखहि न लायै झुकि, . . ' . ., दतिया निकार्ग वीनि येगि हो बगर ते । हो न भई हाती कहीं वाही की सुहाती ऐसी, ..... मान रस:माती हो न बोजी डोली डरते। औलों कहूँ मुरलो की घोर सुनी कान संख', घरीही में देहली दुहेलो भई घर ते । परी तिहि काल हुती पोरो पोरी पाल जनु, • सोरी भई सुनि छुटि. बोरी गई फर ते ॥१३॥ पान ठौर कान देती मनहिं योगह लेती,. . , . मुरली पी धुनि सुनि चितहिं न श्रानती । कान्ह चितये ते तो हो देखि मुसिकानी कत, .. . भूली तव रूखी है के त्यों ही त्योरी तानती। -ली साँझ- संख्या समम । २--नही-सूख। ३-फर फंदल फपट'। ४-दाती-थजग, एक तरफ । ५--हाती-ग्रजग। ६-पोरसोली म्वनि। -दुहेली कठिन (घर से देहरीतक नामा कठित हो गया). HAVA AAAAAAAK AAR