पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/७६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


। सन्कोतिस धौरेही ते धाय धुकि 'बालम' अधीन करि, हिये धकधको दै न धीरजु है धौनी में । अंचल की ओट में हर्गचल लगाइ नेकु, । • मोहि गयो मोहिं सखी चल चितौनी में ।१४३॥ मनु अकुलाय तनु छिनु छिनु जाय जरि, धनु न सोहाय पनु याही ते न जाइहै । 'बेटकु करत जेतो तिय' को 'मरन तेती, लाज को हरन तोसों कोऊ न लजाइहै। ता दिन निकुंज ही ते भाजे भोर 'पालम' सु, ।। मेरे जान चोरि चित अजहूँ भजाइहै। राजिव गनि । तेरे राजत बिलोकि सुग, . . रीझि पसि भई खोमि पहूँ न पगइहै ॥१४॥ खरीय हुती सु तौला परीय विकल कीनी, ____मनु हरि लोनी हेरि अब तन ते गयो । देख्यो न अघाइ नैन लाइ५ तन लाइ रही, - विरह बढ़ाइ श्राइ - जानों विष दै गयो। साँवरे से गात कवि 'पालम' सरोज चख, अचानक श्राइ श्रय आँगन है के गयो। भोरी करि भोरै मोह मोरि याही खोरि सस्त्री, - नेनु मुम्न मोरि फै करोरिक्ष जिय लै गयो ॥१४५० १-पोरे - निकट ! २-धुफि झपट फर । ३-धौनी =(.धमनी) नस 11-1-प्रतिज्ञा। ५-नाइ अनि ! ६--करोरि= श्रन्छ तर खुरच कर - - - - - -