पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/७९

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६२ श्रालमोलिका GK जव कहो देखि मित्र हों तो भयो देखि :चित्र श्रजहूँ लो चित की अचेत - चतुरई, है। रीभयो हो तिहारी इन नैननि की रीमि को जु, कौन मृदु । मरति रिझाय मुरझई . हैr चूंघट की ढिग चाँपि भृकुटी उचाइ 'सेख' मन्द मुसकाइ चपला-सी. कोथि गई है।' तुम सोध वाही के सिधारे,कुंज सुधापुंज, मोहिं. कान्ह घरी एक पाछे सुधि भई है ॥१४॥ छीकत हो गई जु वा साँवरे सो-भेट भई, .:: . सरकी सी दई री-सुभाय सोहे : हेरि के। 'आलमान नीरो आवै येनु दूर ते बजावै, ..; 'दाधे पर लावै लोनु रहो मुख फेरि के। मनु संगही लगाय; गयो सुधि बिसराय, गनत न गति गाई ऊँचे सुर टेरि के। तय ही ते सुधि नाहीं रही कळू मोहिं माही, नंगा ना अनत जाहीं रहे श्रयसेरि'के ॥१४७ चंद को चकोर देव निसि दिन को न लेखै, , . चंद विन दिन छवि, लागत अँध्यारी है। 'मालमा पाहै हो प्राली अलि फूल हेत चले .. . फांटे सी फैटोली बेलि ऐसी प्रीति प्यारी है। - ...xommmmmmm १-रहे अररि फै तिभार कर रहे हैं, पार जा रहे हैं।