पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/८०

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Hोक्तिसमति DVA कारो कान्द : कहत, गवारी' ऐसी लागंति है, ... • मोहिं पाकी स्यामताई लागति उज्यारी है। मनकी अटक यहाँ रुप को विचार कहाँ : .... । रीभिवे को पड़ों तहाँ यूमि कछु न्यारी है ॥१४॥ वरु,करौ जिन्ह सोते वैरिनि भई हैं ग्वारि, तिनहि के धागे बात कान्ह की कहति है। मालम', सुगाय कोऊ गारि लाय हे तव, उनहि मिलेगी जाय ऐसे उमहति है। पलक उचाट, नैना चकि, 'चारी होन ऐसे. ! .. औचक चित के फिरि नीचे को गवति है। वह जय मनसा मे नेकु. ठहरैहै फिरि, .. डीठ ठहराये घर थाहर चहति है ॥१४॥ घर बैठे थैरू कीजै ऊतर५ घनाइ लीज, और . बतियाँ- बनाय उपजे नई नई। , नेक. चाहे मुसकाय.पहुयो :न, चाहो जाय, पलके नधाय लीजै उग टगि सी साई। तय ती सयानु अभिमानु कधि 'आलम' हो, .. जी लो छाली नेकु खोरि, कान्हको नही गई। वापतेन भायों जात कीजतु वाही को भायो, . , 'यातन चितये नेकु जनु पाही की मई ॥१५०n ourmmmmmmmmm R धारी गवारपन । २-सुमाय संदेह करके । ३- वहति है - देखती है। ४-- किसी को निदामय चर्चा । ५. उता = गवाय ।।