पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/८१

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बालम-केलि कहाँ आई वैरिनि वेधिन को सुधि देन, सुधि पायें बुधि जाइ सुधि बुधि हरी है। 'पालमा ए पाली तू तो कालि हुतीभली याज, लाल की सो लगनि भुलानो बिसँभरी है। मोहिं देखि मोहन को मुख देखि मोही हो मु; मेहु है कि नेहु देहु दीन खीन बरी है। घरस सिराने नैना यरसि सिराने नैना,.. गहिली' गधारि श्रजी पहिलिये घरी है ॥१५१॥ निधरक भई अनुगवतिर, है नंद घर, . और ठौर पहूँ टोहे। ह न अहटात है। गौरि पाने पिछवारे कोरे कोरे लागी रहे,.. आँगन देहली याही बीच मैंडराति है। क्षरि रस गती 'सेखः नेकहूँ न होइ हाती। पेम मद माती न गनति' दिन राति है।' जय जय श्रायति है नव कळू भूलिं जाति, भूल्यो लेन श्रावति है और भूलि जाति है ॥१५२४ जयदी जमुन जैहै . सुधि विसराइ ऐहै.. घरो डारि औरनि के संग धाइ आई है। रोम खरी रोष वरी काँपै थरहरै सरी, .. जड़ ह रहति छू जूड़ियो जनाई है। १-गहिली यावली, टन्मत्त। 1-अनुगवति है - अनुगमन करती है । यार पार जाती है। २.-टान महाति है - टूटने से भी नहीं मिलती।