पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/८२

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६५ स०कोक्तिसार . 'पालम'- कहै, हो अवहीं ते रिझवार भई, . । ', दुर्गन दुराई मैं तो अब लौ दुराई है। रूप रस प्यासी भई कान्ह तन डीठि दई, ... ' गागरि भरन गई नैना भरि लाई है ॥१५३४ ढिग चल्यो,आवै अरु ढका' देत ढोली धाह, ढोटा ऐसो , ढीठ नहिं पैयत डगर मैं । नागरी आगरी : हम तासी लँगराई. करै, - ऐसो कान्ह नागर है वसत नगर मैं । . नेकह न कहो फरै करै जैसी मन धरै, । 'बालम' न पाहू डरै देख्यो अचगर में । व मुनि पैहै ऐहै देह गारी चारि नेकु,

नूपुरनि . चारि४'नारि नंद के वगर मैं ॥१५॥

अटकावै मनुसु नटावै तनु टट५ श्रावै, हटक्यों न रहै हारी निपट "हटकि के। ,पटकत मटुकी .. भरकि झटकत 'पट, , चिपट छटकि छूटी लट सु-लरकि के। 'आलम टिकाये सीठि टिक्यो टोफि देकि भुजे, ' "टकटको ताई टरि गयो । सो सटकि के। कटि पीत . पट सरकारी साँट कर नट, ' चटपटी लाय टरिगयो मो 'भटाकि६, के ॥२५॥ १--श-धबा ।। २-लॅगराईसंगरपना, दिठाई। ३- अचार शरारत, छेइ." छाड, ५-नूपुरभि दारिनपुरों का बगना रोरुले । ५--22%3D (तट) निकट । -मो भटकि के मुझको भटका कर ।