पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/८७

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1 सालम-कोलि 'सेख' मनमोहन के मोहन के मंत्र, जंत्र, . मोहिं जे न घाये ते विधाता पैन पाऊँरी । साखतनि' लेत हाथ चंद्रा चल्यों आये साथ, नदिन को नीर धीर उलटि महाऊँ री॥१६॥ प्यार की प्रतीति भये प्रेम को प्रकास इति, तात. रस रीति प्रीति प्रगट जनाई है। से न कधो मैं न ल ही मैन कयौ ऐनं श्रानि,' पैनन की रीति सब नैननि में पाई है ।, कंप यंम स्वेद कछु मोहनि में भेदं मानो, नेह को नवेद दै के लालन पठाई है। चाली कछु और ते उताली धनमाली की, . तोहि यनमाल सौह पाली पनि आई है ॥१६६॥ दीरघ 'ढरे से वे डोल. मतयार से बै, कारे कारे तारे मानो मलिन 'अलिन के । खाये अरसात से सुफूले मुसकात से, पै रातो राती रेखें छौड़े अरुन कलिन के । 'बालम' अलोल दिये केलि के कलोल भरे, ' मानो दोपदोपत न कजल मलिन के । मोहन , प्रतक्ष पिय दच्छन-सुलन्छन से, ' पाली तेरे चच्छनि में लच्छन नलिन के ॥१६७० 1-अपतनि मंत्रालत । २- 3D (फारसी.) निमंत्रण । -मनिन - कपक्ष ।