पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/८८

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७१ गहरु' “फरत फत गवनो हो गिरिधर, । : गझी हो तिहारी सौ कहति गजगामिनी । - __ भली . कीनी.भोर भये हो न भूली चतुराई, ., रोखे भोरा भोर लगु कौन ऐसी भामिनी । कैसे तन बने पट लसत कपोल नख, हँसतदसन दुति दमकै ज्यों दामिनी । मरगजे यागे रस पागे नैना लागे श्रावे, यागेरही पाग घुसि जागे लाल जामिनी ॥१६॥ . मीद छाये रैन के उनीदे ग मूंदे श्रायें,

नींद के पारस इंदोयर निदरत हो।

• पियरो, यदन भयो हियरो छुवत “मोदि, -

सियरो लगत .ज्यों ज्यों नियरो करतु हो ।

'आलम मु प्यारी जिहि ऐसे कै पठाये पिय, जाके दिन प्रति उठि' पगनि ढरत हो। कच मुकुराये मधुकर कोसी 'माल लाल, मुकर 'यिलोको' कत. मुकरें - परत हो ॥१६॥ खरी . अनत्रात हहै पीरियो न खात है.. • : झांकि भाँकि जात. है नेक भये न्यारे हो । 'सेख कहै उनही मिखाइ पठये हो पिय, ' झाँकी दैन' भाये तुम हिये मुकि हारे, हौ। -गहरु = देर । -मरगजे मलगज (शिकमें पड़ा हुआ) ३-भागा जामा।. ४- मुकुराये-छिटके हुए । ५. मुकरे परत हो नकार करते हो।:: ... ... A NMA - - - - - -