पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/९३

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1. आलम लिन औरनि के नागे नाचे और ज्यारिनी सो 'राचे,.. ' हम, सौह नोचो मुख ऊँचो; के दिखाइये । सूधे करि नैने योलो येन जासों यादै चैन, १ ।। .: मैन ..के. उदोत-चारुयाँसुरी बजाइये । नित ही मिलन कवि 'पालमा हो जी के प्यारे, मित्त चित्त पर. हित-यतियां लिखाइये । जासो.ते ठग्यो है मोहिं ताही सो ठगैहीं तोहिं, कौन है ठगौरी, तेरो- मोहि धो सिस्राइये ॥१०॥ देखिये न.भाखिये.न.मन, ही में राखिये, पै,- , आँगन है जैये .बोलो खेलो जालो रसु है । 'पालम कहै हो कोऊ तन की तपनि- हरैः .. . चितये सिराइ ताहि. यहै : पड़ो जसु: है । औरनि की कहा कहाँ बहुतन दिय प्यारे. पीर: पर.. वूझन. नइहै-परिहमु: है।' हो तो, चुप रहो ,जानि इती निठुराई. कान्ह, . तेरे जी में बसी है तो मेरो कहा वसु हे ॥१९॥ तू तो चिते चलि गयो चित हनफीनी. हैहै, . ....मेरे चित चहै. चितवनि भई साल है । यावरी विकल चाहि ठगी ही ठगौरी वाहि, 1. वरी पधू वारे मुख यह बात चाल है । ~ ~ १-परिहमु = दुस।