पृष्ठ:इन्दिरा.djvu/१३

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द्वितीय परिच्छेद ।

इसी तरह ढोते ढोते अन्त में पालकी रक्खी। देखा कि जहां डांकुओं ने पालकी रक्खी है वह स्थान सघनबल और अन्धकारमय है। डांकुओं ने एक साल वाली और तब मुझ से कहा कि,—"तुम्हारे पास जो कुछ हो, उसे दे दो; नहीं तो जान से मार डालेंगे।" यह सुन चट मैं ने अपने अलंकार, वस्त्र, आदि सब दे दिये अंग पर से भी सब महने खोल कर दे दिये; केवल हाथ के कड़े नहीं उतार दिये, सो उन लोगों ने स्वयं उतार लिये। उन लोगों ने एक मलिन और जीर्ण वस्त्र दिया, उसे पहिर कर अपको पहिरी हुई बहुमूल्य साड़ी उतार दी। डांकुओं ने मेरा सर्वस्व ले, पालकी तोड़, उस को चांदी उखाड़ ली। अन्त में आग लगाकर टूटी हुई पालकी को कलाके डकैती का चिन्ह भी मिटा दिया।

तब वे लोग चले और उसी निविड़ वन और अंधेरी रात में मुझे बनैले पशुओं के मुख में समर्पण कर चले। यह देख मैं रोने लगी। मैं ने कहा—"तुम लोगों के पैरों पड़ती हूं, मुझे सङ्ग ले चलो।" हा! उस दुर्दिन में डांकू का सङ्ग भो मुझे वाञ्छनीय हुआ।

एक बूढ़ा डाक् करुणापूर्वक बोला—"बच्चा! ऐसी गोरी स्त्री को हम लोग कहां ले जायें? एख डकैती की अभी शोहरत होगी; तो तुम्हारे समान सुन्दरी युवती हमारे साथ देखते ही लोग हमलोगों को पकड़ेंगे।"

एक युवा डाक बोला,—"मैं इसे अवश्य ले आऊंगा चाहे जेल भी जाऊं तो जाऊं पर इसे छोड़ नहीं सकता।" इस की