पृष्ठ:इन्दिरा.djvu/६५

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दशवा परिच्छेद

न आया। तब तो मैं बहुत ही उदास हुई, किन्तु तब एक बात भी मुझे याद आई। मैं ने आशा से विहवत होकर पत्र लिखने को मना नहीं किया था, पर कब मेरे ध्यान में यह आया कि डाकू मुझे लूह ले गये थे; सो अब क्या मेरीजात बची हुई है? बस यही सोच विचार कर मेरे ससुर और पति ने मुझे त्याग दिया होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है। इसलिये वहां उन का लिखना अच्छा न हुआ। यह बात सुन कर सुभाषिणी चुप हो गयी।

तब मैंने समझा कि अब मुझे कुछ भरोसा नही है। वह समझते ही मैंने खाट पकड़ी।

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ग्यारहवां परिच्छेद।

एक चोरी की नजर!

एक दिन सबेरे उठ कर मैंने देखा कि आज ज्याफ़त की खूब तैयारी हो रही है। रमणबाबू भी थे, उनके एक बड़े आदमी मुवकिल थे; सो दो दिन से मैं सुन रही थी कि वे कलकत्ते आये हुए हैं। रमण बाबू और उन के पिता बराबर उनहीं धनी महाशय के घर आया जाया करते थे। रमण बाबू के पिता जो उन के यहाँ बहुत आया जाया करते थे, इस का कारण यही था कि उनके साथ रमण बाबू के पिता का कारवार का संवंव था। सोई सुना कि तुम्हीं धनी महाशय को आज दोपहर के भोजन करने के लिये न्योता दिया गया है। इसी से रसोई में आज कुछ विशेष तैयारी हो रहा है