पृष्ठ:इन्दिरा.djvu/७६

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
७२
इन्दिरा

तब मैं अपनी आंखों का आसू पोछती हुई सुभाषिणी की ठोह लगाने चली, और उसे मैंने सूने घर में ही पाया। मुझे देखते ही सुभाषिणी का मुखड़ा, मानो प्रातःकाल के कमल की भांति या मानो संध्या समय के रजनीगंधा (१) की भांति मारे आनन्द के खिल उठा, उस का सारा अंग मानों प्रातःकाल में नख से सिख तक खिली हुई चमेली की भांति या मानों चन्द्रोदय के समय नदी की धारा की भांति मारे आनंद के हिल्लोरें लेने लगा। उस ने हंस कर और मेरे कान के पास अपना मुंह ला कर कहा―”क्यों? पहिचाना तो?”

अरे! यह सुनते ही मैं तो मानों अकाश पर से जैसे गिर पड़ी होऊं! फिर बोली―“ऐं! क्या कहा? यह बात तुमने क्यों कर जान ली?”

यह सुन सुभाषिणी ने अपना मुखड़ा और आंखें नचा कर कहा―

“आहा! तो मानों तुम्हारे सुनहले चांद ने आप ही आकर अपने को फंसाया है! अरे! हम लोग आकाश के अपर फंदा फेंकना जानती हैं, तभी से तुम्हारे अकाश से चांद को फंसाकर ला दिया!”

मैंने कहा―“तो―हम लोग कौन―कौन? क्या तुम और रमण बाबू?”


(१) एक प्रकार का सफेद फूल, जिसे गन्धराज भी कहते है। अनुवादक।