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न्याय से सम्बन्ध

विकसित बुद्धि के कारण अपने तथा मनुष्य समाज के हित के सम्बन्ध को जिस का वह एक सभ्य है समझ सकता है। वह जान सकता है कि जिस आचरण से साधारणतया समाज की हस्ती ( Security ) खतरे में पड़ती है उस की हस्ती भी ख़तरे में पड़ती है। इस कारण इस प्रकार के आचरण पर उस के अन्दर आत्म-रक्षा का निसर्ग ( यदि यह बात निसर्ग हो ) जागृत हो जाता है। इस अधिक विकसित बुद्धि तथा साधारण- तथा मनुष्य जाति के प्रति सहानुभूति का भाव रखने की क्षमता के कारण ही मनुष्य अपनी जाति, अपने देश तथा मनुष्य जाति का इस प्रकार ख्याल कर सकता है कि जिस से उनको हानि पहुंचाने वाले कार्यों को देखकर उसके अन्दर सहानुभूति तथा बदला लेने के भाव जागृत हो जाते हैं।

इस प्रकार न्याय के भाव में दण्ड देने की इच्छा का अवयव उस हानि का जो हमको या समाज को पहुंचती है, बदला लेने की प्राकृतिक भावना है। बदला लेने के ख्याल में स्वत: कोई आचार नीति नहीं है। जो अचार नीति है वह यह है कि हम इस ख्याल को बिल्कुल सामाजिक सहानुभूति के आधीन कर देते हैं। प्राकृतिक भावना तो यह है कि किसी मनुष्य का जो कुछ भी काम हमें अरुचिकर हों हम उस से बुरा माने अर्थात् क्रुद्ध हों, किन्तु समाज का ख्याल आ जाने के कारण हम उन कामों से बुरा मानते हैं जो समाज के लिये अहितकर हों। उदाहरणत: मनुष्य ऐसे काम से क्रुद्ध होते हैं जो यद्यपि उन के लिये अहितकर नहीं होता है वरन् समाज के लिये हानिकारक होता है।

बहुत से मनुष्य कहेंगे कि जब हम में इस प्रकार का भाव उत्पन्न होता है कि अन्याय हो रहा है तो हम उस समय समाज