पृष्ठ:उपयोगितावाद.djvu/१३५

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पांचवां अध्याय

एक अशर्फ़ीं। इन सब परस्पर विरोधात्मक सिद्धान्तों का निर्णय केवल उपयोगितावाद ही कर सकता है।

तो क्या न्याय-संगत अर्थात् उचित ( Just ) और मस्लहत अर्थात् सुसाधकता में केवल कल्पित भेद है? क्या मनुष्य जाति अब तक भ्रम में पड़ी हुई थी जो यह सोचती थी कि न्याय ( Justice ) नीति ( Policy ) से अधिक पवित्र चीज़ है तथा न्याय-सङ्गत होने पर ही किसी काम को मस्लहत या सुसाधकता के विचार से करना चाहिये? कदापि नहीं। न्याय के भाव की प्रकृति तथा उत्पत्ति का विवरण, जो हमने दिया है, 'उचित' और 'मस्लहत' में वास्तविक भेद मानता है। जो लोग इस बात को बिल्कुल घृणा की दृष्टि से देखते हैं कि किसी कार्य की आचार-युक्तता उसके परिणाम पर निर्भर होनी चाहिये वे न्याय-युक्तता तथा मस्लहत के भेद को मुझ से अधिक महत्त्व नहीं देते हैं।

यद्यपि मैं उन सिद्धान्तों का विरोध करता हूं जो उपयोगिता को न्याय-युक्तता का आधार न मानकर न्याय-युक्तता का कतिपय आदर्श अपने सन्मुख रखते हैं, किंतु मैं उस न्याय-युक्तता को, जिसका आधार मुख्यतया उपयोगिता है, सारी आचार नीति में सब से अधिक पवित्र तथा मान्य समझता हूं। न्याय-युक्तता ( Justice ) कतिपय उन आचार विषयक नियमों का नाम है जिनका मानुषिक भलाई की प्रधान प्रधान बातों से सम्बन्ध है और जो इस कारण, बिना और किसी विचार के, आचार--विषयक साधारण नियमों से अधिक मान्य हैं। न्याय के विचार की मुख्य कल्पना--अर्थात् किसी आदमी या कुछ आदमियों में अधिकार का रहना---इस बात को प्रदर्शित