पृष्ठ:ऊर्म्मिला.pdf/३५५

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तृतीय सर्ग भर दो, मॉ, भर दो अन्तर तर, तव वेदना, व्यथा, करुणा से, आप्लावित कर दो अभ्यन्तर, भर दो, मों, भर दो अन्तर तर । इति श्री तृतीय सर्ग श्री लक्ष्मणार्पणमस्तु ।