पृष्ठ:ऊर्म्मिला.pdf/८९

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? ? ? सखि कल्पने, देख तो यह आनन्द और उल्लास महा । किस आकर्षण से खिच आया, क्यो यह सहसा उमड़ रहा राग-रग यह क्यो छाया है ? यह कैसा प्रवाह पाया है ? परम-प्रतीक्षा-सरिता का तट कहो, आज क्यो सरसाया है अवधपुरी के द्वार-द्वार पर बँधे हुए है बन्दनवार । कौन आ गई है जिन के हित आज सजे ये नन्दन द्वार (२) गगन विचुम्बित नर-पति गृह के सिह-द्वार खुले है आज, चतुर शिल्पियो की चतुराई सर्व दिशा में रही विराज । राज-भवन कोना-कोना- चमक रहा ज्यो निर्मल सोना , चेतन तो क्या ? जड भी प्रमुदित- स्वागतार्थ है बना सलोना । सखि, कुछ तो कह, यह सब क्या है, कौन शुभ घडी आई है आज किस लिए कोशलपुर की गली-गली हुलसाई है ? का