पृष्ठ:ऊषा-अनिरुद्ध.djvu/१४३

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।

राधेश्याम-कीर्त्तन।

(लेखक-पं॰ राधेश्याम कथावाचक)

"राधेश्याम कीर्त्तन" भजनों की पुस्तक है। इसके भजन बड़े ही मधुर और रसीले शब्दों में रचे गए हैं । जहाँ कहीं भी हार्मोनियम और तबले पर यह भजन गाए जाते है वहाँ सुनने बाले तसवीर होकर रह जाते हैं । बड़े बड़े कठोर और शुष्क हृदय वाले भी इन भजनों को सुनकर पसीज उठे हैं। ईश्वर प्रार्थना, विद्या की महिमा, संसार की असारता, प्राकृतिक दृश्य, भक्ति, ज्ञान वैराग्य. नीति, सदाचार, कर्तव्यशीलता, पातिव्रत धर्म आदि नाना विपयों पर सुन्दर भावों से भरे हुए मधुर रचना वोले, अनेक भजन इस पुस्तक में मिलेंगे। यह भजनों की पुस्तक लोगों ने इतनी ज्यादा पसन्द की है कि थोड़े हो समय के भीतर इसको छःवफ़ा छपवाना पड़ा है। दाम ।।)

राधेश्याम-विलास।

(लेखक-पं॰ राधेश्याम कथावाचक)

यह भी एक अनोखी पुस्तक है । इसमें श्री राधाकृष्ण की लीलाओ से सम्बन्ध रखनेवाले, नाटक की चाल के गायन है। प्रत्येक भजन से रस टपका पड़ता है। भगवान का गुणानुवाद भी हो और कानों में रस भी पड़े इस उद्देश्य को पूरा करने वाली यह पुस्तक बड़ी उपयोगी हैं। हजारों आदमियों की भीड़ में एक पद गादिया और सन्नाटा फैलगया। हाथ कान को पारसी क्या है एक पुस्तक मंगाकर देखलीजिए । ठाइटिल पर श्रीराधाकृष्ण का तिरका चित्र भी इस बार छापा गया है। लग भग २५० गानो की पुस्तक का दाम)


पता--श्री राधेश्याम पुस्तकालय, बरेली ।