पृष्ठ:ऊषा-अनिरुद्ध.djvu/३२

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
( १५ )

वैष्णव कुमार, शैव कुमारी को बरे जब,
इस वृद्ध की श्रात्मा को तमी चैन मन हो ।

बाणासुर-(वाण दिखाकर ) तो जा, सदा के लिये मौन होजा

[वाण मार देता है।]
 

विष्णुदास--आह ! [वाण लगने से गिरजाना ] धर्म पालन हो- गया । लेना, लेना, वैष्णव सम्प्रदाय के उपासको, विष्णुदास ब्राह्मण के बेटे चिरञ्जीवी कृष्णदास, इस अत्याचारी से मेरी हत्या का बदला लेना । (मृत्यु)

कृष्णदास--(आकर) लूंगा, लूंगा, इस हत्याकारी से बदला अवश्य लूंगा । धर्मवेदी पर पलिदान होने वाले बूढ़े पिता, तुम सुख के साथ विष्णु-लोक को जाओ । इस अत्याचार का समा- चार भगवान विष्णु तक पहुंचानो। पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्र, तुम सब इस हत्या के साक्षी हो । मैं अगर विष्णुदास का पुत्र हू; मैं अगर वैष्णव सम्प्रदाय की रज हूं, तो पिता की इस लाश के पास खड़े होकर प्रतिक्षा करता हूं कि शैव और वैष्णवों का झगड़ा मिटा दूंगा । इस अशान्ति का शान्ति के साथ बदला लूंगा।

वाणासुर--साँप के बच्चे, चुप होजा । सिपाहियो, इसे भी करलो गिरफ्तार ।

कितने ही वैधाव--(आकर) बस खबरदार!

[अचानक इन वैष्णयों को देखकर वाणासर और सिपाहियों का आश्चर्य में प्राजाना कि हमारे राज्य शोणितपुर में इतने लोग आज वैष्णव होगये!]