पृष्ठ:ऊषा-अनिरुद्ध.djvu/५२

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माधो०--जय रघुनाथजी की बच्चा, जय रघुनाथजी की। आओ, सत्संगजी सुनलो।

कृष्णदास--बड़ी अच्छी बात है । मैं तो इसीलिए आया हूं।

माधो०--“लक्ष्मणेन सहारण्ये रामो राजीवलोचनः ।
सीतामन्वेषयन् शैलं ऋष्यमूकमुपागमत् ॥"

अब कीचकंधा काण्ड प्रारम्भ होता है । अयोध्याकाण्ड, उत्तरकाण्ड, युद्धकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, आरिन्यकाण्ड, बालकाण्ड, बारी बारी से छै काण्डों का तो सत्संग होगया। अब सातवाँ

काण्ड--कींचकंधा काण्ड-चलता है ।

सरयू--तो महाराज, बालकाण्ड के बाद कीचकंधा कागड भाता है?

माधो०--हां बच्चा। छठा काण्ड बालकाण्ड, उसके आगे सातवाँ काण्ड कीचकंधाकाण्ड आता है । इस काण्ड में नारद और सनत्कुमार ऋषि का सम्वाद है। धनों में बरसात का पानी नहीं सूखा था, बड़ी कीच कंध थी। इसी से वाल्मीकिजी ने इस काण्ड का नाम कीचकंधा काण्ड रक्खा है।

कृष्ण--(स्वगत) शोक ! महाशोक !! यह क्या ऊटपटाँग बकता है ! जिसे काण्डों के क्रमतक का ज्ञान नहीं है वह आज सत्संग करता है ? सचमुच ऐसे ही मूखों ने वैष्णव धर्म का झंडा गिराया है, और अपने आपही अपने इष्टदेव का हास्य कराया है । और यह इलोक तो भी वाल्मीकीय रामायण का नहीं है !

माधो०-हाँ भैया, सुनो--

“सीतामन्वेषयन् शैलं ऋष्यमूकमुपागमत् ।”

ऋयि कहिए रीछ, और मूक कहिए गूंगा । अर्थात् रामजी