पृष्ठ:ऊषा-अनिरुद्ध.djvu/६०

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माधुरी--अच्छा, तो तुम भी अपना स्वप्न सुनाडालो ।

सरस्वती--यदि मैं सुनाऊंगी तो तुम सब हंसोगी।

प्रभा--हंसने की बात होगी तो हंसेगी, अकारण थोड़ेही हंसेंगी !

सरस्वती--अच्छा तो सुनो । मैंने स्वप्न में देखा कि मेरे पति लक्ष्मी नामक एक दूसरी स्त्री से अपना विवाह कररहे हैं और मैं भी प्रसन्नता पूर्वक उस विवाह में सम्मिलित हो रही हूं। भला, तुम्ही बताभो, क्या ऐसा स्वप्न सच्चा हो होसकता है ?

प्रतिमा--कदापि नहीं।

सरस्वती--मैने तो अनेकों बार स्वप्न देखे हैं, परन्तु आज तक एकभी स्वप्न सच्चा न निकला।

प्रभा--और मेरी तो सुनो, मेरा स्वप्न इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक है।

ऊषा--अच्छा, तो तू भी सुना।

प्रभा--मैंने स्वप्न में देखा कि मैं जब रसोई बना चुकी तो परोसने के समय भूलसे एक कच्ची रोटी अपने पति की थाली में रखगयी । उन्होंने क्रोध में भरकर मेरे गिलास खींचकर मारा। वह गिलास तो मेरे नहीं लगा। परन्तु मैंने जो उनके बेलन मारा वह लग गया। [सबका हंसना]

माधुरी--परन्तु मेरा एक स्वप्न तो सच्चा निकला।

मनोरमा--अच्छा तो तुमभी उस स्वप्न को सुनायो ।

माधुरी--एक बार मैंने स्वप्न में देखा कि मेरा विवाह मेरेही ग्राम के किसी मतवाले युवक के साथ होगा। मेरे पिता तीन वर्ष तक वर की तलाश में घूमे, पर मन्तमें वही स्वप्न सच्चा हुआ।