पृष्ठ:एक घूँट.djvu/३९

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एक घूँट


को प्यार करे, मेरे शरीर को––जो मेरे सुन्दर हृदय का आवरण है––सतृष्ण देखे। उस प्यास में तृप्ति न हो, एक-एक घूँट वह पीता चले, मैं भी पिया करूँ। समझे? इसमें आपकी पोली दार्शनिकता या व्यर्थ के वाक्यों को स्थान नहीं।

आनन्द––(जैसे झेंप मिटाता हुआ) श्रीमती, मैं तो पथिक हूँ और संसार ही पथिक है। सब अपने-अपने पथ पर घसीटे जा रहे हैं, मैं अपने को ही क्यों कहूँ। एक क्षण, एक युग कहिये या एक जीवन कहिये; है वह एक ही क्षण, कहीं विश्राम किया और फिर चले। वैसा ही निर्मोह प्रेम सम्भव है। सबसे एक-एक घूँट पीते-पिलाते नूतन जीवन का संचार करते चल देना। यही तो मेरा संदेश है।

वनलता––शब्दावली की मधुर प्रवञ्चना से आप छले जा रहे हैं।

आनन्द––क्या मैं भ्रान्त हूँ?

वनलता––अवश्य! असंख्य जीवनों की भूल-भुलैया में अपने चिरपरिचित को खोज निकालना और किसी शीतल छाया में बैठकर एक घूँट पीना और पिलाना क्या समझे! प्रेम का एक घूँट! बस इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं।

आनन्द––(हताश होकर अन्तिम आक्रमण करता हुआ) तो क्या आपने खोज लिया है––पहचान लिया है?

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