पृष्ठ:एक घूँट.djvu/४०

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एक घूँट

वनलता––मैंने तो पहचान लिया है। किन्तु वही, मेरे जीवन-धन अभी नहीं पहचान सके। इसी का मुझे...

(रसाल आकर प्यार से वनलता का हाथ पकड़ता है और आनन्द को गूढ़ दृष्टि से देखता है)

आनन्द––अरे आप यहीं––

रसाल––जी...........(वनलता से) प्रिये! आज तक मैं भ्रान्त था। मैंने आज पहचान लिया। यह कैसी भूलभूलैया थी।

आनन्द––तो मैं चलूँ...... (सिर खुजलाने लगता है)

वनलता––यही तो मेरे प्रियतम!

आनन्द––(अलग खड़ा होकर) यह क्या! यही क्या मेरे सन्देश का, मेरी आकांक्षा का, व्यक्त रूप है! (वनलता और रसाल परस्पर स्निग्ध दृष्टि से देख रहे हैं। आनन्द उस सुन्दरता को देखकर धीरे-धीरे मन में सोचता-सा) असंख्य जीवनों की भूलभुलैया में अपने चि...र...प...रि...चि...त

(रसाल और वनलता दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़े, आनन्द की ओर देखकर हँसते हुए, चले जाते हैं; आनन्द उसी तरह चिन्ता में निमग्न अपने-आप कहने लगता है) चिरपरिचित को खोज निकालना! कितनी असम्भव बात! किन्तु.........परन्तु.........विल्कुल ठीक......मिलते हैं––हाँ, मिल ही जाते हैं, खोजनेवाला चाहिये।

प्रेमलता––(सहसा हाथ में शर्बत लिये प्रवेश करके)

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