( ८४ ) अतिरिक्त लंबे चौड़े और विस्तीर्ण परिणाम न निकालें । थोथेलो- मैं ऐसा नहीं करूँगा । यागो -- श्रीमान् यदि प्राप ऐसा करेंगे तो मेरे कहने का ऐसा खुप फल होगा कि जैसा कभी मेरे विचार में भी नहीं आया है । केलियो मेरा योग्य मित्र है | भगवन् | मैं देखता हूं कि याप विचलित होगये हैं । ओथेलो -- नहीं मैं बहुत विचलित नहीं हुआ हूँ । मैं इसके अतिरिक्त और कोई बात नहीं लोचता हूँ कि देशदामिनी सच्चरित्रा है। यागो-वह ऐसी ही चिरंजीव रहें, और आप ऐसेही विचार: करते हुए चिरंजीव रहें। प्रोथेलो- तथापि उसका प्राकृतिक स्वभाव अपने यथोचित मार्ग को कैसे भूल सकता है ? यागो - हाँ यही तो विचारणीय बात है। यदि मैं आपको विना क्रेश दिये स्पष्टरूप से कुछ कह सकूँ तो इसके विरुद्ध कहा जासकता है। मैं देखता हूँ कि प्रकृति की प्रवृति प्रत्येक विषय में समानताही की ओर झुकती है, किन्तु उसने अपनी बराबरी के कई विवाह- आर्थकों को जो उसके स्वदेश, वर्ण और पद के थे नहीं वराहै । छो! उसके ऐसे चरणों से कोई व्यक्ति यह संभावना करसकता है कि वह व्यन्त कामातुर है, उसमें दुष्ट वैषम्य है और उसके विचार प्रकृति विरुद्ध हैं । परन्तु आप मुझे क्षमा करें, यह उदाहरण जो मैंने दिया है, इसमें मेरा वादानुवाद सर्वसाधारण है और उसका लक्ष्य श्रीमती देशदामिनी जी हो पर नहीं है, तो भी मेरा यह भय संभव है कि उनकी आकांक्षा जब अपनी निर्णय शक्ति के अनुसार चलेगी तब वैषम्यप्रसमानता | wrv 82492 .
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