(१०) करने का मुझे क्या बोध था ? मैंने हले कभी देखा नहीं था, सोखा नहीं था, उससे मेरी कुछ हानि नहीं थीं । मैं कल रात श्रानंद से सोयाथा, मैंने भलीभांति खाना खाया था, मैं निश्चिन्त और प्रफुल्ल था। मैं यह नहीं जानता था कि उसके अधर केसियो से वित हो रहे हैं। यदि किसी की कोई वस्तु चोरी गई हो और उसका प्रभाव न जाने पड़े तो उससे कुछ मत कहो, तो वह समझेगा कि मेरा कुछ नहीं खोया गया है । यागो-यह सुनकर मुझे बड़ा खेद होता है । ओथेलो -यदि मेरे संपूर्ण सैनिक सफरमैना इत्यादि मेरी श्री का उपभोग करते और मुझे इस बातका ज्ञान नहीं होता, तबभी मैं सानंद रहता । परन्तु हा ! कब है शान्ति ! हे संतोष ! सर्वदा के लिये मेरे हृदय स्थानको छोड़दो ! मैंने तुमको तिलांजलि दो ! पंखसे विभूषित सनाच्या ! वीर संग्रामो ! जो अच्काको घ बनाडालते हो, तुमभी विदा होजाओ। हिनहिनाता हुआ युद्ध का अश्व, कर्कश तुरही, वीररस उत्पादक रामटोल, कर्णभेदक भेरी, विजय पताका, और अभिमान, ऐश्वर्य्यादि सब गुणों, और कोचि शाली संग्रामकी सामग्री, और हे नाशकारिणी तोपो ! जिनके कठोर मुखोंसे अमर इन्द्र के भयंकर गर्जन की सी ध्वनि निकलती है तुमको भी दंडवत् है ! प्रणाम है ! प्रोथेलो न घरका रहा न घाट कर रहा ! यागो - महाराज ! क्या ऐसा होना कभी संभव है ? ऑथेलो- अरे प्रधम ! इसवातका निश्चय करले कि त मेरी प्यारी का वेश्या होना प्रमाणात कर सके। इसबातका निश्चय करने मुझे इसका चातुष प्रमाण दे नहीं तो मैं अपनी पूज्य अमर थापा की शपथ खाकर कहता हूँ कि मेरे उभाड़े हुए क्रोध का परिणाम
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