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पृष्ठ:ओथेलो.pdf/१२३

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विदूषक - मैं उसके विषय में संसार के लोगों से प्रश्नोतर करूँगा' अर्थात् पहिले प्रश्न बनाऊँगा और फिर उनसे सीखूँगा कि आपको क्या उत्तर देना चाहिये । देशदामिनी-उसको ढूँडो और उससे कहो कि वह सीधा यहां चला घ्यावं । उससे यह कहना कि मैंने अपने पति से उसके लिये बहुत कुछ कहा और आशा है कि सब बात ठीक होजायगी । विदूषक - ऐसा काम कोई साधारण बुद्धिवाला व्यक्ति कर सकता है और इसलिये मैं ऐसा करनेका उद्योग करूँगा । ( जाता है). देशदामिनी - यमिलिया बहजातो मैंने वह रूमाल कहां छोड़ा होगा ? यमिलिया - महाशया, मैं नहीं जानती । देवदामिनी- तू इसबातको सत्य समझ कि यदि मेरी शर्फियों की थैली खोई जाती तो मुझको इतनी चिन्ता न होती जितनी कि मुझे इस कमाल के खोये जाने से हुई है। किन्तु इतनी बात मच्छी है कि मेरे महानुभाव निष्कपट हैं, और उनके ऐसे नीच विचार नहीं हैं जैसे कि सन्देही जनों के हुआ करते हैं नहीं तो इससे ही उनको मेरे विषय में बड़ा संशय होजाता । यमिलिया-क्या वह संदेही नहीं हैं ? देशदामिनी - कौन ? वे मैं समझती हूँ कि उनकी उष्ण जन्म- भूमि के प्रचंड सूर्य्यने उनके ऐसे पंकिल विचार शुष्क कर रहते हैं। यमिलिया - देखिये के यहां आरहे हैं। देवदामि उनका पीछा अब जबतक कि वे केसियो को नहीं बुलायेंगे मैं छोडूंगी । ( मोलो का प्रवेश । ) देशदानी-प्राणप्यारे ! आप अच्छे तो हैं ?