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पृष्ठ:ओथेलो.pdf/१२६

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140120 ( १०१ ) भरा था। वह सिद्ध स्त्री सुर्यनारायण के पूरे दोसौ परिक्रमण दे कर मरी थी। जिस समय सपर कोई देवता उतरता था और बाह भाषी कथन करने लगती थी उसी समय वह बस रूमान को काढती थी । ये कीड़े जिनके रेशम से वह बनाया गया था मंत्रों से शुद्ध किये गये थे। प्रौर वह उस सुगन्धित द्रव्य से रंगा गया था कि जो औषधि और अभिचार के काम में काता है और जो इ कृत्य के जिये कुँवारियों के शवों से जिनमें विलक्षणता से उनके हृदय संरक्षित रखे गये थे, बनाया गया था ।

देशदामिनी -- यथार्थ में क्या यह सच्ची बात है ? श्रोथेलो- अत्यन्त सत्य है, इसलिये बलको अच्छी तरह हूँ ढो देशवासिनी -- यदि ऐसी बात थी तो परमेश्वर करता वह मेरी दृष्टि में ही न पड़ता । प्रोयेजो- ह ! ! क्यों? देशदामिनी - ग्राम ऐसे उद्याप और तीक्ष्णता से क्यों बोल रहे हैं ? -- ओथेलो -यता क्या वह खोया गया है ? या कहीं ऐसी जगह चला गया है कि जहां से मिल ही नहीं सकता है ? देशदामिनी - परमेश्वर हमारा कल्याण करें । प्रोयेलो- तुम क्या कहती हो ? देशदामिनी - वह खोया नहीं गया है, पर मान लीजिये कि वह खोया गया है तो ? ओथेलो -कैसे !

  • मिश्रदेश में प्राचीनकाल में यह प्रथा थी कि मृत्यु होनेपर पुरुष और

स्त्रियों के शव कुछ विशेष औषधियों के द्वारा संरक्षित रखे जाते थे । इस के ममी कहते हैं ।