(११३ ) हाव, भाव, कटाक्ष पर भलीभांति दृष्टि रखना, मैं आपको माता मरियमकी शपथ देता हूँ कि आप धैर्य धारण करें, नहीं तो मुझे यही कहना पड़ेगा कि आप केवल बदला लेनेको अनुभूति से भरे हैं और आपमें मनुष्यत्व कुछभी नहीं हैं । भोथेलो-यागो ! क्या तू सुनरहा है ? निश्चय रख कि तू मुझ को धैये में पारंगत पावेगा, परंतु साथही यहभी सुनले मैं रक्त- पिपासु भी बन जाऊँगा । )) यागो - यह बात ठोक है, परन्तु हमको किसी बातमें व्यग्रता नहीं करनी चाहिये और सदैव समयानुकूज चलना चाहिये । प्याप अलग होजाइये । ( ओथेलो अलग होजाता है | ) ( अपने आप । अब मैं केसियोले वियंका का प्रसंग छहूँगा । वह एक लौंडी है जो अपना यौवन विक्रम करके अपने लिये रोटी कपड़ा पैदा करती है, वह छोरी केलियोपर लट्टू है और जैसा बेश्याओं में रोग होता है कि वे सेकड़ों को भरमाती हैं पर आप एक के पंजे में पड़ जाती हैं ऐसीहो यह भी केसियो पर प्रासक्त है । जब वह उसकी चर्चा सुनेगा बिना खिजखिलाकर हँसे नहीं रहेगा। वह इधर ध्यारहा है। (केसियोका पुनः प्रवेश ) जैसेकि वह मुस्करावेगा, प्रोथेलो बावला बन जायेगा और सन्देही प्रोथेलो जिसने प्रेमसम्बन्धी कोई पुस्तक नहीं पढ़ो है, वेचारे केसियो के हाव भाव और चुलबुलाहट का उलटा अर्थ जगावेगा । ( प्रकट ) कहो सहकारी जी अच्छे हो ?
- मरियम-ईसाइयों के प्रभु ईसामसीह की माता ।