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पृष्ठ:ओथेलो.pdf/१४०

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(१२५) भोथेलो - ( अपने आप ) ऐसाही होता है ! पेसाक्षी होता छ । ऐसाही होता है ! जो हाथ मारते हैं, वे हँसते हैं | यागो-सचमुच लोग कहते हैं कि तुम्हारा उसके साथ परि- गाय होने वाला है। केलियो- तुम्हारे हाथ जोड़ता हूँ व्यर्थ वकवाद न करो । थागो-हाँ, सच कहता हूँ, नहीं तो सुरु पापात्मा समस्तना । ओयेलो- ( अपने भाप ) तुमने मेरे अच्छा नीजका टीका लगाया ! भला । केलियो -यह बात उद बंदरीने अपने आप फैलायी है । उनने अपनेही अँथमेव और मायामोहले यह विश्वास कर लिया है कि. मैं उसके साथ ब्याह करुँगा, मैंने कोई प्रतिशा नहीं की है 3 ओथेलो- (अपने आप ) या गुहा सैन से कहना है कि घार वह उस कथा का आरम्भ करता है । केलियों वह अभीतक यहांथी। यह जहां में जाताहं मेरा पीड़ा नहीं छोड़ती है, उस दिन में समुद्र के किनारे कुछ यों के साथ बातचीत कररहाथा। वह बिचौनी यहां आपहुँची और इस हाथ की शपथ, उसने इसमांति मेरे गलबहियां डालदीं । ( यागों के गम हाथ बाँधकर डालता है | ) श्रोथेलो- ( अपने श्राप ) ही इस समय उसने जिल्लाकर मानो यह कहा होता "हे प्यारे के लियो " शुई के हाव भाव से यह बात कलकती है। केलियो - वह इसीभांति मेरे पीछे लगी रहती है, लिपटती रहती है और मुझको देखकर रो देती है । कहीं मुझे खींचती है, कहीं घसीटती है । हो ! हो ! ही ! श्रोथेलो- ( अपने आप ) देखो वह यह कहता है कि