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पृष्ठ:ओथेलो.pdf/१५२

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( १२७ ) के हेतु हैं तो मेरे मत्थे इस अपराध को मत मढ़िये । जब कि के आप से अलग होगये हैं तो मुझसे भी लग होगये हैं। मुझे संसार में आपसे अधिक कोई प्रिय नहीं है । प्रोथेलो- यदि परमेश्वर की इच्छा मुके घोर यातना में दी डालने की थी तो यह अच्छा होता कि वह सब भांति के क्लेश और कलंकों की मेरे श्ररक्षित सिरपर बौछाड़ करता, सुके भोजन और वसन से भी रहितकर नंगा बनाता, और मेरी सब आशाओं को भंग करता । ताली मेरे हृदयमें धैर्य का कुछ लेश रहता । परन्तु हा हा! उसने मुझको देला निश्चल पुतला बनाया है कि जो तिर स्फाररूपी समयकी मंदगामिनी गुलीका लक्ष्य है। भला इलको भी मैं सहलेता । किन्तु हाथ! उस स्थानसे, जिसे मैंने अपना प्राण- निवास बनाया है और जिसपर मेरा जीवन या मध्ण निर्भर है, और उस स्रोतसे जिससे मेरी जीवनरूपी धारा या तो बहती है या सूख जाती है, यातो विकाल दिया जाना या उसका ऐसा सजिन कुंड बनाके रखना चिलम नेटके जाल बुनकर घंडे देती है मेरे लिये स है । यह कैसा भयंकर विचार है कि बातो में अपनी मिया से विमुक्त होजाऊँ या उसको अत्यन्त घृणास्पदे येति ब्रष्ट होगेहूँ । ऐसी दशामें है धीरज ! लूसी अपना रंग बदल डाल | हे गुलाबी कपोल वाले नवज स्वर्गीय दूत ! तू अपनी नर्क के समान भीषण आकृति बनादे ! देशदामिनी- मैं समझती हूँ कि मैं अपने महानुभाव प्राणनाथ की दृष्टि में सती हूं । भोथेलो-हां ठीकडे, तू पसंदी पतित्रता और जितेन्द्रिय है जैसी ग्रीष्म ऋतु की कामुक मक्खियां होती हैं, जो बूचड़ की दुकान में अण्डे देने के समय ही फिर गर्मी होजाती है । है चांडाली ! तू... ऐसी मनोरम सुन्दर है जैसा एक तीक्ष्य सुगन्धि युक्त पुष्प होता है,