सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:ओथेलो.pdf/१५३

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

( १२८) जिसके सूँघने से सिर भिन्ना जाता है। तू जन्मही न लेती तो अच्छा होता देशदामिनी- शोक! मैंने अनजाने ऐसा क्या घोर पाप किया है? प्रोथेलो- क्या यह ऐसा, शुभ्र कोमल कागज, ऐसी अत्यन्त मनो पुस्तक इस लिये बनाये गये थे कि उनपर 'रेडी' शब्द लिखा जाता । कहती है क्या पाप किया ? क्या पाप किया ? परी तू सार्वजनिक गणिका है। जो में तेरे कुरुम्मों की कहानी कहूँ तो मेरे गाल निके समान लाल जाल बनकर लज्जा को भस्मीभूत करडालेंगे। कहती है क्या पाप कियाहै ? प्रकाश उस पापको मंत्र को नहीं सह सकताहै, और चन्द्रमा उसको देखकर अपनी यख बंद कर लेता है । ऋघोरी पवन भी जो, जो कुछ पाता है उसका चुंबन किये विना नहीं रहता, उस पापको सुनने को अपेक्षा पृथ्वी के गर्भ में चिपजाना पसंद करता है । क्या पाप किया कहती है ? क्या पाप किया ? निर्लज्ज वेश्या ! देशदामिनी--ईश्वरकी शपथ, आप मेरे लिये अन्याय कर रहे हैं। ओथेलो -क्या तू पातर नहीं है ? देशदामिनी- मैं प्रभु ईसामसीह की भक्त हूँ, मैं कदापि ऐसी नहीं होसकती । यदि इस शरीररूपी मंदिर को अपने पति के लिये किसी दूसरे पुरुष के शास्त्रविरुद्ध संस्पर्श से सदैव रक्षित रखना, वेश्या नहीं है तो में कदापि ऐसी नहीं है ? ओथेलो - क्या तू रंडी नहीं है ? देशदामिनी-नहीं, क्योंकि मुझे नरक नहीं जाना है । प्रथेजो - क्या यह सम्भव है ? देशदामिनी, परमेश्वर हमारे अपराध क्षमा करें । ओथेलो - तो फिर मैं तुमसे समा प्रार्थना करता हूँ मेरी जानतो