(१३९) सब मिल गाम्रो पिय. परित्याग । केमद्रुम के नीचे बैठी HIE वियोगिन भरती थी, सिर घुटने पर रखकर अपना, हाथ हिये पर धरती थी । सब मिल गाओ पिय परित्याग ॥ निर्मल नदियां ढिंग वह उसके विलाप में स्वर देती थी, लोनी आँसूधारा वह कर, पिघला पत्थर देती थीं. सबमित गाओ पिय परित्याग । मैं तुझसे प्रार्थना करती हूँ शीघ्रता कर वे अभी आपहुं वेंगे । ( गाती है ) सब मिल गानो मेरा होवे, त्याग पिया से लगे न वार । कोई उनपर दोष न लाभो, मुझे ष्प्रवक्षा ष्प्रवक्षा हैं स्वीकार । नहीं यह दूसरा पद नहीं है- सुनो तो वह कौन खटखटा रहा है? मिलिया वह पवन है । देशदामिनी - ( गाती है ) मैं बोली जब 'पिय तुम खोटे, मुझ से बोले वे उचार | सब मिलगाओ पियपरित्याग 'यदि मैं रमता बहुत रमशियाँ तुम बहुजन सँग करो विहार' अच्छा अब तू चलीजा प्रणाम! मेरी घाँसे खुजला रहीं है क्या इससे रोने की संभावना होती है ?
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