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पृष्ठ:ओथेलो.pdf/१६६

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27.2221 ....... (१४११ संपत्ति के लिये यदि अपने पतिके भयापनाने से वह संसारका अधिपति होजाय तो कौनसी ऐसी स्त्री हैं जो ऐसा काम नहीं करेगी। मैं तो निःशङ्क होकर इसके लिये चान्द्रायणकी प्रथा चला डाला देशदामिनी-मुझे धिक्कार है, यदि मैं सारी संसार की प्राप्ति के हेतु भी ऐसा कुकर्म करूँ । यमिलिया- क्यों, यह तो केवल संसार की दृष्टि में कुकर्म है और जब ऐसे काम के लिये आपको सारा संसार मिल जाये, तो वह कुक्रमं प्रापंकही संसार में तो होगा और आप उसको तुरन्त ठीक ठाक कर सकती हैं । देशदा मिनी- मेरे विचार में तो कहीं कोई ऐसी स्त्री नहीं होगी। 4 यमिलिया- हां, ऐसी बीसियों हैं, प्रत्युत इनसे कितनीही अधिक हैं जो इस संसार की प्रभुताकी प्राप्ति के हेतु इतना व्यभिचार करने से भी नहीं चूकेंगी कि जिससे सारे जगतमें जारपुत्र ही जारपुत्र भर जायँ । मेरी समझ में तो स्त्रियाँ अपने पतियों के दोषों से व्यभिचारिणी होती हैं। उदाहरणा के लिये देखिये, कहीं तो वे अपना कर्तव्य पूरा नहीं करते हैं, और कहीं अपनी धन संपत्ति पर त्रियाओं पर न्योछावर करदेते हैं। या कहीं हमारे विषय में निष्कारण सन्देह में पड़कर हमें बंधन में डाल देते हैं । या कहीं वे हमको मारते पोटते हैं या द्वेष से जो जेबखर्व हमको देते हैं, उसको कम करदेते. हैं। क्यों क्या हममें क्रोध और द्रोह नहीं है ? और दक्षं यद्यपि हमारा कोमल स्वभाव होता है तथापि बदला लेने की इच्छा भी तो होती ही है । अव जो लोग भर्त्ता हैं, उनको यह समझ लेना चाहिये कि उनके समान उनकी स्त्रियों में भी अनुभूतियां होती हैं । वे अपने पतियों को भांति देख सकती, सूघ सकती और

  • भड़भा=जारिणीपति ।