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पृष्ठ:ओथेलो.pdf/१७५

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(१५०) दूसरा- दृश्य | एक शयन स्थान देशदामिनी पलंग पर सोरही है और दीपक जल रहा ( ओथेलो का प्रवेश ) f प्रोथेलो-हे मेरी आत्मा ! क्यों खेद करती है ? यदी कारवा यही कारण है। हे पुण्य नक्षत्रमंडली मैं उस पापमय कारया का नाम तुमको नहीं बतलाना चाहता, यही कारण है, परन्तु में उसका शोणितपात नहीं करूँगा । और न मैं उसकी हिम से अधिकतर गोरी और स्मारक चिन्होपयोगी मणिशिला से अधिकतर कोमल देह को चिन्हित ही करूँगा । तौभी उसका मरदा ही अमोष्ट है, नहींतो वह और लोगों को भी अपने जाल में फँसावेगी । पच्छा तो पहिले दीपनिर्वाण करदेना चाहिए, तब उसके जीवनरूपी दीप का निर्माण करना ठीक होगा । हे दीपकज्योति ! यदि मैं तुमको बुका दूँ तो जब चाहूँ इसका पश्चात्ताप होने पर तुझ को फिर तेरी पहिली ज्योति देसकता हूँ-पर हे सौन्दर्यमयी प्रकृति की उत्तम. तम आदर्श प्राकृति ! यदि मैं तेरी ज्योति बुझाहूँ तो वह संजीवनी बूटी कहां है जो मैं तेरी बुझी हुई ज्योति को फिर प्रज्वलित कर सकूँ ? जब मैं तेरे शरीररूपी वृक्ष से जीवरूपी गुलाब को तोड़ डालूँगा तो फिर मैं उसमें प्राणसंचार नहीं करसकता। वह अवश्य मुरझा जायगा । जबतक वह तेरे देहरूपी वृक्षमें लगा है aans ही मैं उसकी सुगंधि तेलू । ( देशदामिनी को चूमता अहा ! कैसा सुधारस भरा है, जो निठुर न्याय को भी अपने पथ है 1) डिगा देता है ! अच्छा एकवार और एकवार और ( दो वार चूमता हैं। ) यद्यपि न्याय मुझे तेरा वध करने के लिये विवश करता है x मूल में प्रोमिथियन हीट है देवताओं की मग्नि प्रोमिथियन ने चुरानी थी। जिससे मृतप्राणी जीवित होजाते थे।