( १५३ ) श्रोथेलो- हां मैं तुझे अभी मारडालूँगा । इसलिये तू खुले मन से अपना पाप स्वीकार करते । क्योंकि सौगन्ध खाकर प्रत्येक भातसे सुकरजाने में मेरा जो पक्का निश्चय तेरे पापक विषय में होरहा है, वह न तो जायगा और न रुकेगा । मेरी आत्मा इससे अत्यन्त दुखी होरही है। तू अभी भरेगी। देशदामिनी-तो परमेश्वर तुझपर करुणा करें। ओथेलो- मैं पत्रमस्तु कहता हूँ । देशदामिनी -- और आप भी मुझपर करुणा करें । मैंने अपने जीवन भरमें कोई आपका अपराध नहीं किया है, मैंने केलियो को साधारण भांति प्यार करने के अतिरिक्त जैसे कि सजातियों को प्यार करना चाहिये ऐसा प्यार कभी नहीं किया है जो ईश्वर के समक्ष दोषयुक्त हो। उसको मैंने कभी कोई प्रेम उपहार नहीं दिया है । मोथेजो-स्वर्गकी शपथ, मैंने अपना रुमाल उसके हाथ में देखा है। हे झूठी नारी ! तूने मेरा हृदय पाषाणावत् कठोर बनादिया है और तू मेरे बस कर्म्म को जो मैने "वलिदान सोचा था "स्त्री- इत्याश्वनाया चाहती है । मैंने अपनी भांखों से इस रूमाजको उसके पास देखा है। देशदामिनी-तो उसने उसको कहीं गिराहुआ पाया होगा मैंने उसको वह कभी नहीं दिया है। उसे यहां बुलाइये और सच्चीबांत स्वीकार कराइये। श्रोथेलो- उसने स्वीकार कर लिया है। देशदामिनी- क्या स्वीकार किया है ? स्वामिन् ! भोयेलो - फ्रि उसने तेरे साथ विहार किया है । देशदामिनी - क्या पापयुक्त विहार ? मोथेलो - हां देशदामिनी-वह कभी ऐसा नहीं कहेगा ।
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