( १५४) श्रोथेलो--नहीं, उसका मुँह बंद होगया है । सत्यशील यागोगे उसका प्रबन्ध कर दिया है । देशदामिनी - हाय ! तब तो मेरा यह डर सत्य होना जान पड़ता है कि आप ठगये हैं। क्या वह मरगया है ? प्रोथेलो-यदि उसके इतने प्राण होते जितने कि उसके शरीर के बाल है तब भी मेरी प्रतीकाररूपी जठराग्निमें वे सब अस्म हो जाते देशदामिनी - शोक ! उसके साथ विश्वासघात कियागया है और मेरा भाग्य फूटगया है । (रोती है । पोथेलो- तू ऐसी दोठ है कि मेरे सामने केसियो के वास्ते रोती है । देशदामिनी हे प्राणनाथ | मेरा देशनिकाला करदीजिये पर मेरा वध न कीजिये । ( उठती है । ) मोथेलो-बैठ रंडी ! देशदामिनी - अच्छा मुझे कल मारना, मुझे व्याजरात तो छोड़ दीजिये । प्रोथेलो- नहीं यदि तू बचने का प्रयास करेगी । देशदामिनी - केवल माथा घंटा ठहर जाइये ! ओथेलो अब बहुत देर होगई है, दया दर्शाने की प्रार्थना करना व्यर्थ है, जबकि मैं बदला चुकाने के लिये उतारू होगया हूँ तो उसमें विलंब नहीं होना चाहिये। देशदामिनी - इतनाही ठहर जाइये कि मैं एक प्रार्थना भर करसकूँ । प्रोथेलो--ब बहुत ही ढोल हो गई है । (उसका गला घोटता है।) व्यमिलिया -- ( नेपथ्य में ) हे मेरे प्रभु ! हे मेरे प्रभु ! हे मेरे !! आप क्या कर रहे हैं ? v ..
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