- ( १६४ ) प्रोथेलो मेरा इस कोठी में एक और शल रक्खा हुआ है वह स्पेन देशका खड्ग है । हिमले बुझाया हुआ दोनेसे उसका पानी जैसा का तैसा है । याहा ! वह यह है, कनिष्ठ ससुरजी में यह था पहुँचा । अत्यानो-यदि तुने पाने का प्रयत्न किया तो, तू इसका फल चपखेगा । मैं शस्त्रसज्जित हूँ। तेरे पास कोई शस्त्र नहीं है और तू अवश्य मार खायगा । www ओथेलो तो अच्छा मेरी घोर सिर उठाके तो देखले और मेरे साथ बात तो करले, नहीं तो मैं प्रस्त्ररहित ही तुझपर चाकण लगा। मूत्थानो-क्या यात है ? भोथेलो-देखा ! मेरे हाथ में मन है। इससे अच्छा पत्र कभी किसी सैनिक की जंघापर नहीं लटका | मैंने यह दिन देखाई जब इसी अच्छे से और इसी छोटे हाथ से मैं तुम से बीस गुणी अधिक वाघा देने वालों के घेरे को कुछ न गिनकर उसके बीच में होकर निकल जाता था । किन्तु हा ! अब यह अहंकार वृथा है ! eat afता पर किसका पश चलता है ? अब मेव वह दिन नहीं रहा है । इस समय चाहे तुम मुझे प्रस्त्र धारण किये देखते हो पर तुम मुझको देखकर मत डरो। यह मेरी जीवनरूपी यात्रा का अंत है - मैं अपने ठिकाने पर पहुंच चुका हूँ । यही अन्तिम स्थल है जहाँ तक कि मेरी समुद्रयात्रा निर्दिष्ट थी। तुम डरकर क्यों -पोछे हटते हो? तुम्हारा भय निर्मूल है । मेरे मनकी वर्तमान अवस्था में कोई भंगुर हथियार प्रत्युत एक विनुका मात्र भी मुझे पराजित करने के लिये बहुत है। प्रोतो का ठिकाना कहाँ है! हे मंद- भागनी तरुणो ! हाय अब तू कैसी दिखलाई पड़ती है?दाय तू ऐसी पीली पगई है जी कि तेरी बोली है ! अन्तिम न्याय के दिन
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