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पृष्ठ:ओथेलो.pdf/१९

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( १८ ) यागो। भागो सांसारिक पण्डित है, परन्तु दुष्टात्मार्थो का शिरोमणि है । यह श मन घुना है, उसकी दुर्जनता को क नहीं होती है और परमार्थ का तो उसमें लेशमात्र भी, नहीं है । उस की योग्यता का क्या कहना है ? वह तो उसके पद पद पर टपकती । चाहे कैसी ही कठिनाई का सामना आपड़े वह इतना प्रवीण के कि उसको सहज ही में टाल सकता | वह संघ निश्वन धीर, गंभीर, चौकन्ना और लाइसी रहता है । वह जो कुछ षड्यंत्र रचता है, उसकी रचना में उसके मनकी तरंग को शीघ्रता से बाधा नहीं पड़ती है । उसको जिस व्यक्ति के साथ बाहे जिस अवस्था में रख दीजिये वह अपने को उसके अनुकूल बना लेता है। इसका प्रकट स्फुट बक्तापन उसे प्रत्येक का विश्वासपात्र करदेता है। प्रत्येक को अपना विशेष मित्र समता है वह प्रत्येक "सत्यशील यामो" है। उसकी पत्नी यमिलिया तक को भी जो उसके साथ बहस रही और जिसको मानवी प्रकृति की पहिचान का बहुत कुछ ज्ञान था, वह यह बात विदित नहीं हुई कि वह ऐसा दुष्ट था । नैतिक अवस्थाको छोड़कर इस पुरुष की प्रत्येक बात प्रशंसनीय है और वह अपनी जीवनयात्राको सफलता के साथ पूरी करनेके लिये सांगोपांग योग्य है। और इसके प्रसुफल होने का केवल एक कारण यह है कि वह धर्म से राहत था। वह नहीं जानता था कि संसार में धर्म भी कोई वस्तु है और उसमें कुछ शक्ति भी रहती है। को लुटने में भी इस बात का विचार नहीं हुआ कि धर्म का इतना प्रभाव यमिलिया पर पड़ेगा कि वह उसका भंडा फोड़ कर देगी। वह धर्मरहित पुरुषार्थ को ही सब कुछ समझता था । अपनी -इच्छा शक्ति परही उसका बड़ा भरोसा था । इससे बढ़कर और किसी शक्ति को संसारमें वह नहीं जानता था । चाहे कैसाही नीक कामहो यसको करने में वह घृणा नहीं करता था । वह विवेकराहितथा