( १६६) श स्वीकार कर लिया है। क्या इस दुष्ट ने तुम्हारी सम्मति से केलियों के मार डालने की चेष्टा की थी ? श्रोथेलो-हाँ । केसियो-प्रिय सेनापति जी ! मैंने कभी आपकी कोई अपराध नहीं किया है। श्रोथेलो- मुझे इसका पूरा विश्वास है और में तुमसे क्षमा वाहता हूं । याप कृपापूर्वक उस पिशाच से पूछियेगा कि बस मे इस भांति क्यों मेरे शरीर और आत्माको घनघोर संकट में डाला है ? यागो-मुझ से कुछ न पूछिये जो बात है आप जानते ही हैं । मैं भाजके दिन से कभी अपना मुँह नहीं खोलूँगा ! लादोविको-क्या तू प्रार्थना करने के लिये भी ऐसा नहीं करेगा? प्रत्यानो - जब मार पड़ेगी तब तेरे होंठ खुलेंगे। प्रोथेलो-इसी में श्रेय है कि तू अपनी जिह्वा बंद रक्खे । लोदोविको - महाशय, जो जो बातें हुई हैं आपको विदित हो जायँगी। मैं समझता हूँ कि आप इससे जानकार नहीं है। देखिये मृत रौदरिगो के जेब में यह एक चिट्टी मिली हैं और यह एक दूसरी चिट्ठी भी मिली है उनमें से एक में यागो ने रौदरियों का यह जिस रक्खा है कि वह केसियो को मार डाले। श्रथेलोरे पापी ! केलियो-भरे निर्लज्ज अधमाधम म्लेच्छ ! लोदोविको और देखिये यह दूसरी चिट्ठी है- यहभी उसके खोसे में मिली है। इसमें दरिगो योगों के व्यवहार से संतोष प्रकट करता है। इस विट्ठी को वह इस नीच पिशाचको भेजने को था पर ऐसा प्रतीत होता है कि यागो उससे मिल गया और उसने उसका पूराही निबटारा करडाला । मोथेलो- अरे अपकारक नराधम ! कहो केसियो, वह कमाल मेरी भायों का था तुम्हारे हाथ कैसे लगा था ? के सियो-मैंने उसको अपने कमरे में पड़ा हुआ गाया था। उसने अभी यातको स्वीकार कर लिया है कि किसी विशेष कारणसे जिससे
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