(२१) जनों के फन्दे में फँस जाते हैं वह यागोके चक्र में पड़गया था। न उस में ऐसी सृद्धि थी कि वह यागो की बाल समझता और न इतनी धर्मे की यात्रा ही थी कि वह अपनी कुत्सित इच्छाओं को रोक सकता, और उन दुध फंदों में फंसने से वत्रता, जिनसे में उसकी मृत्यु हुई। प्रवंशी - नाटकके और पात्रों में सिवाय प्रवेशो के कोई कुछ अङ्कित करने योग्य नहीं है । ववंशो एक प्रेमीपिता था, पर वह ज्ञानी नहीं था । उसने देशामिनी के भगा लेजाने पर ऐसाही व्यवहार किया है जैसे बहुधा साधारण मनुष्य कियाकरते हैं । वह इतना क्रूर बनगया कि उसने स्वाभाविक पैत्रिक मृदुलता, और बुद्धिमता कोमी तिलांजलि देदी। यदि वह कुछ तमा गुण दिखजा सकता तो संभव था कि उसकी लाड़लों पुत्रो और जामाता का ऐसा महान दुःखान्त न होता । शिक्षायें । इस नाटक से कई शिक्षायें मिलती हैं उनमें से कुछ इस जेव के आरंभ में और नाटकपात्रों के चारेत्र वर्णन में आगई हैं। इस नाटककी बड़ी भारी शिक्षा मेरी समझ से यह है कि हम को इस संसार में रहने के लिये धर्मानुकूल सांसारिकपण्डित होना था- वश्यक है | इस नाटकके जितने मुख्यपात्र हैं अर्थात भोथेलो, देश- दामिनी, केखियो, यागो, रौदरिंगो, यमिलिया, इनमें सिवाय यागो और यामलियाके कोई भी सांसारिक पण्डित नहीं था । श्रोथेलोने यामों का हकमाराथा, के लियोको उसका हकमारकर वहुपद मिलाया, इतनेपर भी प्रोथेलो, कसियो व देशदामिनी उससे सचेतनहीं रहे। रौदरियो तो निरा भोंदू ही है यागो पूर्ण सांसारिकपण्डित अवश्य है, परन्तु इस में सच्चरित्रता रत्तीभर भी नहीं है, इसी से वह कृतका नहीं हुआ। यमिलिया में नैतिक साहस ( Moral courage )
पृष्ठ:ओथेलो.pdf/२२
दिखावट